योग वह है जो आपको आनंद और विश्राम प्रदान करता है - गुरु श्री श्री रविशंकर

गुरुदेव श्री श्री रविशंकर।

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योग का सत्य - प्रत्येक आसन को इस बात को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए कि इसका लक्ष्य केवल आसन का सही होना नहीं

खबरिस्तान नेटवर्क। परिभाषा के अनुसार 'आसन' एक ऐसी मुद्रा है जो स्थिर और सुखद होती है। योगासन करते समय आपको सहजता का अनुभव होना चाहिए। सुख की परिभाषा क्या है? जब आप शरीर को महसूस नहीं करते हैं। यदि आप किसी असुविधाजनक मुद्रा में बैठे हैं तो आपको शरीर के उन हिस्सों में दर्द होने लगता है। आपका ध्यान वहाँ की असुविधा पर अधिक होता है। जब आप कोई आसन करते हैं तो सबसे पहले आपको जो अनुभव होता है वह है असुविधा। किंतु यदि आप मन को वहाँ से गुज़ारते हैं, तो आप पाएंगे कि कुछ ही मिनटों में असुविधा विलीन हो गई है और आप शरीर को अनुभव नहीं कर रहे हैं। आप आसनों के द्वारा विस्तार या अनंतता को महसूस करते हैं।

आसन कैसे करना चाहिए? एक मुद्रा में स्थित हो जाएँ और सभी प्रयास छोड़ दें। फिर क्या होता है? आप अनंत में विश्राम पाते हैं । इसलिए प्रत्येक आसन को इस बात को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए कि इसका लक्ष्य केवल आसन का सही होना नहीं है, बल्कि अपने भीतर के विस्तार का अनुभव करना है। योग आसनों में यह सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है। योग का उद्देश्य न केवल एक अच्छा शारीरिक आकार बनाए रखना है, बल्कि अपने भीतर अनंत और कालातीत विस्तार का अनुभव करना भी है; और कुछ समय के अभ्यास के बाद आपके साथ ऐसा होने लगता है।

योग की दूसरी परिभाषा दृश्य से द्रष्टा तक वापस आना है। धीरे-धीरे अपना ध्यान बाहर से अंदर की ओर ले जाएं। सबसे पहले पर्यावरण से अपना ध्यान भौतिक शरीर पर लाएं। फिर एक कदम आगे बढ़ें क्योंकि शरीर भी दृश्य है और अपना ध्यान मन पर लगाएँ। अब जब आप मन में आने वाले विचारों को देखते हैं, तो वह भी दृश्य बन जाता है। गहराई में जाएँ । दृश्य से उस द्रष्टा तक आना, जो भीतर सब कुछ देख रहा है, योग की एक अन्य परिभाषा है।

जब भी आप जीवन में सुख, प्रसन्नता, आनंद और उल्लास का अनुभव करते हैं, तो जाने या अनजाने आप द्रष्टा के स्वरूप में ही रहते हैं। इसके अतिरिक्त  आप मन की विभिन्न वृत्तियों  के साथ होते हैं, आप उनमें खोए रहते हैं।

मन की वृत्तियाँ


मन की ये विभिन्न वृत्तियाँ क्या हैं? मन के परिवर्तन पाँच रूपों में होते हैं; जिनमें से कुछ क्लिष्ट हैं और कुछ क्लिष्ट नहीं हैं। य़े हैं:

प्रमाण: जब मन प्रमाण चाहने में लगा हो

विपर्यय: अर्थात विपरीत ज्ञान

विकल्प: का अर्थ है एक काल्पनिक धारणा, जो वास्तविकता के अनुरूप नहीं है

निद्रा: जिसका अर्थ है नींद

स्मृति: अतीत की स्मृति में रहना

मन की ये पाँच वृत्तियाँ या परिवर्तन मनुष्य की क्षमता को कम कर देते हैं। मन की इन व्यवस्थाओं पर नियंत्रण रखना ही योग है। वे घोड़ों की तरह हैं। घोड़ों की लगाम अगर आपके हाथ में है तो आप उन्हें दिशा दे सकते हैं, लेकिन अगर आप घोड़े की दया पर हैं तो यह आपको वहीं ले जाता है जहाँ खुद जाता है। इसलिए कहा गया है, 'योगः चित्त वृत्ति निरोधः' - योग वह है जो मन की वृत्तियों को नियंत्रित करता है।

जब आप किसी आसन का अभ्यास करते हैं, तो इसका लक्ष्य सहज सुख  और विस्तार का अनुभव करना है; अनुभव करने की इच्छा से नहीं, बल्कि जाने देने से; कुछ न करने से। अतः योग में पहला कदम है जाने देना, विश्राम करना और योग में अंतिम चरण भी जाने देना और विश्राम करना है।

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