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ख़बरिस्तान नेटवर्क : चंडीगढ़ स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी (PU) में एफिडेविट और सीनेट-सिंडिकेट विवाद खत्म होने के बावजूद माहौल शांत नहीं हुआ है। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने जहां एफिडेविट का फैसला वापस ले लिया है और केंद्र सरकार ने सीनेट-सिंडिकेट भंग करने का नोटिफिकेशन रद्द कर दिया है, वहीं अब छात्र नए मुद्दे को लेकर विरोध पर उतर आए हैं।

छात्र मांग रहे सीनेट चुनाव की तारीख
अब विवाद सीनेट चुनाव की तारीख को लेकर खड़ा हो गया है। स्टूडेंट यूनियन ने यूनिवर्सिटी में सीनेट के सभी 91 सदस्यों के चुनाव की तारीख घोषित करने की मांग की है। पहले छात्रों ने 10 नवंबर को विरोध प्रदर्शन की घोषणा की थी, लेकिन सुरक्षा बढ़ते देख 9 नवंबर की रात को ही गेट नंबर दो पर धरना शुरू कर दिया।

गेट नंबर दो पर धरना, पुलिस से झड़प
छात्रों ने “पुलिस गो बैक” के नारे लगाते हुए यूनिवर्सिटी के गेट नंबर दो पर धरना दे दिया। कई पेरेंट्स भी छात्रों के समर्थन में पहुंच गए, जिनकी पुलिस से बहस हो गई। हंगामे के बढ़ने पर पुलिस ने सख्ती दिखाते हुए यूनिवर्सिटी परिसर के बाहर भारी सुरक्षा तैनात कर दी। विरोध को देखते हुए करीब 2000 पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई है। एसएसपी कंवरपाल कौर भी रात में मौके पर पहुंचीं।

चुनाव प्रक्रिया शुरू- वाइस चांसलर
इस बीच वाइस चांसलर प्रोफेसर रेणु विग ने कहा कि यूनिवर्सिटी ने शिक्षा मंत्रालय की 7 नवंबर की नोटिफिकेशन के बाद सीनेट चुनाव की प्रक्रिया शुरू कर दी है। लेकिन छात्र नेताओं का कहना है कि जब तक चुनाव की तारीख घोषित नहीं की जाती, तब तक उनका प्रदर्शन जारी रहेगा।

जानें क्या होता है सीनेट और सिंडिकेट
सीनेट यूनिवर्सिटी की सबसे बड़ी फैसला लेने वाली संस्था है, जिसमें 92 सदस्य होते हैं। इनमें से 49 चुनाव जीतकर आते हैं, 36 को नामजद किया जाता है और बाकी एक्स ऑफिशियो (पद मुताबिक) होते हैं। सीनेट का चुनाव चार साल के कार्यकाल के लिए होता है।

वहीं अगर सिंडिकेट की बात करें तो इसमें 18 सदस्य होते हैं, जिनमें से 15 चुनाव जीतकर और 3 पदेन होते हैं, जिनमें वाइस चांसलर भी शामिल हैं।

चाहे यूनिवर्सिटी के खर्च, भर्तियों, किसी जांच, छात्र शुल्क या अन्य किसी भी मामले का मामला हो, उसे सबसे पहले सिंडिकेट में रखा जाता है। अगर सिंडिकेट इसे पारित कर देता है, तो इसे चर्चा के लिए सीनेट में रखा जाता है और अगर सीनेट इसे पारित कर देती है, तो फैसला लागू हो जाता है। कोई भी फैसला अकेले कुलपति के हाथ में नहीं होता।

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