परमहंस योगानंद की 133वीं जयंती के अवसर पर उनकी आध्यात्मिक शिक्षाओं और अमूल्य विरासत को देश-दुनिया में एक बार फिर स्मरण किया जा रहा है। “बाकी सब कुछ प्रतीक्षा कर सकता है, लेकिन ईश्वर की खोज प्रतीक्षा नहीं कर सकती” योगानंद का यह कालजयी संदेश आज भी मानव को आत्म-साक्षात्कार और आंतरिक शांति की दिशा में प्रेरित करता है।
5 जनवरी 1893 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में जन्मे परमहंस योगानंद प्रारंभ से ही गहरी आध्यात्मिक चेतना से जुड़े रहे। उनके गुरु स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि के मार्गदर्शन में उन्होंने आत्मिक ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त किया। वर्ष 1915 में संन्यास ग्रहण करने के बाद, 1920 में उन्होंने अमेरिका की यात्रा कर क्रिया योग के माध्यम से ध्यान की वैज्ञानिक पद्धति को पश्चिमी देशों तक पहुंचाया।
योगानंद की विश्वप्रसिद्ध कृति “ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी” आज भी विश्व की सबसे प्रभावशाली आध्यात्मिक पुस्तकों में शामिल है। इस पुस्तक ने स्टीव जॉब्स सहित अनेक महान व्यक्तित्वों को जीवन-दृष्टि प्रदान की और आधुनिक युग में आध्यात्मिक चेतना को नई पहचान दी।
1917 में स्थापित योगदा सत्संग सोसाइटी (YSS) आज भी आश्रमों, ध्यान केंद्रों और आध्यात्मिक साहित्य के माध्यम से योगानंद के संदेश का प्रसार कर रही है। उनका मानना था कि आध्यात्मिकता जीवन से पलायन नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों के बीच संतुलन, साहस और आनंद के साथ जीने की कला है।
परमहंस योगानंद का संपूर्ण जीवन प्रेम, करुणा और दिव्य चेतना का जीवंत उदाहरण रहा। उनका सरल किंतु गहन संदेश आज भी लाखों लोगों को आंतरिक शांति, आत्मिक आनंद और ईश्वर से प्रत्यक्ष जुड़ाव की राह दिखा रहा है।