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मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध का असर अब इंटरनेट और डेटा कनेक्टिविटी पर भी पड़ने लगा है। भारत सरकार ने टेलीकॉम कंपनियों और समुद्र के नीचे केबल बिछाने वाली कंपनियों को जोखिम का आकलन करने और बैकअप प्लान तैयार रखने के निर्देश दिए हैं।

दरअसल, समुद्र के नीचे बिछी केबल्स ही दुनिया भर के इंटरनेट ट्रैफिक की रीढ़ हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज भारत के लिए बेहद अहम है, क्योंकि देश का करीब एक-तिहाई डेटा ट्रैफिक इसी रास्ते से अमेरिका और यूरोप तक जाता है।

इंटरनेट स्पीड धीमी हो सकती

अगर इस क्षेत्र में केबल्स को नुकसान पहुंचता है, तो इंटरनेट स्पीड धीमी हो सकती है और कनेक्टिविटी प्रभावित हो सकती है। कुछ ट्रैफिक को सिंगापुर रूट से डायवर्ट किया जा सकता है, लेकिन वह पूरे लोड को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।

बैकअप रूट न केवल महंगे हैं, बल्कि लंबी दूरी के कारण इंटरनेट की स्पीड पर भी असर डाल सकते हैं। ऐसे में लेटेंसी बढ़ने और सेवाओं के धीमे होने का खतरा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर स्थिति बिगड़ती है, तो फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन, ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया जैसी सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। हालांकि पूरी तरह इंटरनेट बंद होने की संभावना कम बताई जा रही है।

Reliance Jio, Bharti Airtel और Tata Communications जैसी बड़ी कंपनियां स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। वहीं, युद्ध के कारण केबल रिपेयर का काम भी मुश्किल हो गया है, जिससे समस्या और बढ़ सकती है। लंबे समय तक संकट जारी रहने पर भारत के डेटा सेंटर और डिजिटल इकोनॉमी प्लान पर भी असर पड़ सकता है।

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