ख़बरिस्तान नेटवर्क : यदि हम जीवन के सभी सुखों को गहराई से देखें, तो पाएँगे कि हर सुख के साथ एक “कर” भी लगा होता है, और वह “कर” है दुःख। किसी वस्तु को पाने से पहले उसे पाने की बेचैनी पीड़ा देती है। जब वह मिल जाती है, तो उसे खो देने का भय दुख देता है। और जब वह चली जाती है, तो उसकी मधुर स्मृतियां भी मन को व्यथित करती हैं। इस प्रकार आरंभ से अंत तक वही सुख किसी न किसी रूप में पीड़ा का कारण बन जाता है।
जो आनंद हमें मिले, वह हमें विश्राम और संतोष भी दे, अन्यथा वही आनंद धीरे-धीरे बोझ बन जाता है। जैसे किसी को गुलाब जामुन प्रिय है। वह एक, दो, तीन या चार खा सकता है, पर पाँचवाँ शायद आनंद के स्थान पर असुविधा देने लगे। यही संसार की प्रत्येक वस्तु का स्वभाव है।
महर्षि पतंजलि, जिन्होंने योग के विशाल ज्ञान को सरल योगसूत्रों में संकलित किया, कहते हैं- “हेयं दुःखमनागतम्” अर्थात जो दुःख अभी आया नहीं है, उसे रोका जा सकता है। योग का उद्देश्य ही यही है कि दुःख आने से पहले ही उसे समाप्त कर दिया जाए।
पर यह कैसे संभव है?
महर्षि पतंजलि ने दुःख के पाँच मूल कारण बताए हैं – अज्ञान, अहंकार, आसक्ति, द्वेष और अज्ञात का भय। अज्ञान वह है, जब हम नश्वर को शाश्वत और शाश्वत को नश्वर समझ लेते हैं। यही जीवन की सबसे बड़ी भूल है, जो हमारी दृष्टि को भ्रमित कर देती है। अपने बारे में बनाई हुई कोई कठोर धारणा हमारे विकास को रोक देती है और हमारी संभावनाओं को सीमित कर देती है।
अहंकार हमारे भीतर के उच्च स्वरूप को ढक देता है और मन को संकीर्ण बना देता है। इच्छाएँ मन को बेचैन रखती हैं और द्वेष उसे शिकायतों से भर देता है। भय जीवन में थोड़ी मात्रा में सजगता के लिए आवश्यक है, जैसे भोजन में नमक, परंतु अधिक भय असुरक्षा और पीड़ा का कारण बन जाता है।
ये पाँच कारण स्वयं दुःख नहीं हैं, लेकिन जब इनके कारण क्रोध, ईर्ष्या और निराशा जैसी भावनाएँ जन्म लेती हैं, तब यही भावनाएँ दुःख के बीज बन जाती हैं। इसलिए उस दुःख को, जो अभी अंकुरित भी नहीं हुआ, प्रारंभ में ही रोक देना चाहिए।
यह कैसे हो?
अक्सर हम अपनी नकारात्मक भावनाओं के सामने स्वयं को असहाय पाते हैं। न विद्यालय में, न घर में हमें यह सिखाया जाता है कि अपनी भावनाओं को कैसे संभालें। यदि मन दुखी है, तो हम दुखी ही बने रहते हैं और समय के सहारे उसके मिटने की प्रतीक्षा करते हैं।
योग हमें इस स्थिति से बाहर निकलने का रहस्य देता है। यह हमें अपने मन का स्वामी बनाता है, ताकि हम अपनी भावनाओं के गुलाम न होकर अपनी चेतना के अनुसार जीवन जी सकें।
योग केवल आसनों का नाम नहीं है; योग जीवन जीने की कला है। जैसे एक फूल की कली के भीतर पूर्ण खिलने की संभावना छिपी होती है, वैसे ही प्रत्येक मनुष्य के भीतर अपनी संपूर्ण क्षमता को प्रकट करने की संभावना होती है। यही जीवन का पूर्ण विकास योग है।
योग के अभ्यास से अज्ञान का पर्दा धीरे-धीरे पतला होता जाता है और मन निर्मल होने लगता है। जो क्रोध पहले हमें घेर लेता था, वही अभ्यास के बाद धीरे-धीरे कम होने लगता है। दुःख का पर्दा पारदर्शी हो जाता है।
आनंद का स्रोत हमारे भीतर ही है। बाहरी घटनाएँ आती-जाती रहती हैं। मन को स्वच्छ दर्पण की तरह रखना और परिस्थितियों से विचलित न होना ही योग है। योग वह विज्ञान है जो हमें हल्का बनाता है। यह मन से क्रोध, ईर्ष्या, घृणा और लालच का भार उतार देता है। दुःख का अस्तित्व यह नहीं कहता कि हमें संसार से भाग जाना चाहिए। यह संसार आनंद के लिए है। सुंदर दृश्य देखने के लिए हैं, स्वादिष्ट भोजन ग्रहण करने और आनंद लेने के लिए है। पूरा संसार हमारे अनुभव और आनंद के लिए है, लेकिन आनंद लेते हुए अपने ‘स्व’ को भूलना नहीं चाहिए।
आप जो देखते हैं, उससे अलग हैं। जो अनुभव करते हैं, उससे भी अलग हैं। जो घटनाएँ आती-जाती हैं, उनसे भी परे हैं। यही विवेक है।
योग की मूल शिक्षा है, मन की समता बनाए रखना। जब हम किसी भी कर्म को सजगता और जागरूकता के साथ करते हैं, तभी हम सच्चे अर्थों में योगी बनते हैं।
क्या आपने अनुभव किया है कि प्रसन्नता में भीतर विस्तार का अनुभव होता है और असफलता या अपमान के क्षण में मन जैसे सिकुड़ जाता है? योग उसी भीतर के विस्तार और संकुचन को पहचानने की साधना है। यह हमें अपनी भावनाओं का स्वामी बनाता है, उनका दास नहीं।
एक शिशु से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है। एक बच्चा जन्म से ही एक सहज योगी होता है। सोते समय भी उसके हाथों में चिन मुद्रा दिखाई देती है। संसार के किसी भी कोने में शिशु जब लेटता है तो पहले अपने पैरों को उठाता है, फिर पेट के बल आता है और अपने कंधों को उठाने का प्रयास करता है, जैसे भुजंगासन।
हर बच्चा इस धरती पर योग का स्पर्श लेकर आता है। उसका मन तनाव से मुक्त और आनंद से भरा होता है। लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, भय, इच्छाएँ और अपनी छवि को बनाए रखने का संघर्ष हमारे भीतर प्रवेश कर जाता है। योग हमें उसी मूल स्रोत की ओर लौटाता है, “जहाँ हम सरल, सहज और आनंदमय थे। यही योग का वास्तविक अर्थ है।