पंजाबी अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ को रिलीज के महज दो दिन बाद ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 से हटा दिया गया। इससे पहले यह फिल्म लंबे समय तक ‘पंजाब 95’ नाम को लेकर विवादों में रही थी। फिल्म हटाए जाने के बाद दिलजीत इंस्टाग्राम लाइव पर आए और उन्होंने इस फैसले पर नाराजगी जताई।
दिलजीत ने कहा, “मुझे फिल्म हटने का दुख नहीं है, क्योंकि यह लोगों तक पहुंच चुकी है। दुख इस बात का है कि इंसानियत खत्म होती जा रही है। प्यार, इत्तेफाक और इंसानियत जैसी चीजें अब कम होती नजर आ रही हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें पहले से अंदाजा था कि ऐसा हो सकता है। “मैंने सोचा था कि अगर फिल्म दो-तीन दिन भी चल गई तो हमारा मकसद पूरा हो जाएगा। इंटरनेट पर एक बार कोई चीज आ जाए, तो उसे पूरी तरह हटाना आसान नहीं होता।”
एक प्रशंसक द्वारा नए प्रोजेक्ट के बारे में पूछे जाने पर दिलजीत ने कहा, “एक प्रोजेक्ट था, जो अब बैन हो गया है। अब हम अपने यूरोप टूर की तैयारी करेंगे, जिसकी शुरुआत बर्लिन से होगी।”
ZEE5 ने क्या कहा?
ZEE5 ने आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए ‘सतलुज’ को अगले आदेश तक प्लेटफॉर्म से हटाया गया है। कंपनी ने कहा कि वह सभी कानूनी विकल्पों पर काम कर रही है ताकि फिल्म को जल्द से जल्द दोबारा दर्शकों के लिए उपलब्ध कराया जा सके। साथ ही, प्लेटफॉर्म ने फिल्म को मिले दर्शकों के प्यार और समर्थन के लिए धन्यवाद भी दिया।
फिल्म हटाने पर शुरू हुई राजनीति
फिल्म हटाए जाने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं। शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि पंजाब के इतिहास और मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित इस फिल्म को इस तरह हटाना अभिव्यक्ति की आजादी और ऐतिहासिक सच को दबाने जैसा है।
लंबे विवाद के बाद रिलीज हुई थी फिल्म
फिल्म की घोषणा वर्ष 2022 में हुई थी और शुरुआत में इसका नाम ‘घल्लूघारा’ रखा गया था। बाद में इसे बदलकर ‘पंजाब 95’ किया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सेंसर बोर्ड ने फिल्म में कई बदलाव और 127 कट्स सुझाए थे, जिसके चलते भारत में इसे सिनेमाघरों में रिलीज नहीं किया जा सका। इसके बाद फिल्म को संशोधित रूप में ‘सतलुज’ नाम से ZEE5 पर रिलीज किया गया, लेकिन दो दिन बाद ही इसे प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया।
जसवंत सिंह खालड़ा पर आधारित है कहानी
फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन से प्रेरित है। खालड़ा ने पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों और गुमशुदगी के मामलों को उजागर करने का दावा किया था। उनके परिवार के अनुसार, वर्ष 1995 में उनका अपहरण कर हत्या कर दी गई थी। बाद में इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई थी।