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ख़बरिस्तान नेटवर्क : मानसिक रूप से स्वस्थ होने का क्या अर्थ है? मानसिक रूप से स्वस्थ होने का अर्थ है, शांत और स्थिर होना और भीतर से भावनात्मक रूप से कोमल होना। जब आप भीतर से कोमल महसूस करते हैं, जब मन प्रवाह में होता है या निर्णायक (जजमेंटल) नहीं होता, तब वह स्वस्थ होता है। मानसिक स्वास्थ्य उस प्रवाह का नाम है जो हमारे अंतरतम से बाहरी दुनिया तक और बाहरी दुनिया से भीतर तक चलता है।

जीवन की चार विशेषताएं हैं: उसका अस्तित्व है, वह विकसित होता है, अभिव्यक्त होता है, और समाप्त होता है। जीवन इन चारों पहलुओं के लिए पांच तत्वों, पृथ्वी, जल, वायु, आकाश (ईथर) और अग्नि पर निर्भर है। संपूर्ण ब्रह्मांड, जिसमें हमारा शरीर और मन भी शामिल है, इन तत्वों से बना है। प्रत्येक तत्व एक इंद्रिय से जुड़ा है: पृथ्वी से गंध, जल से स्वाद, वायु से स्पर्श, आकाश से ध्वनि, और अग्नि से रूप। ये सभी तत्व सूक्ष्म रूप से हमारे भीतर मौजूद हैं।

हमारा मन भी इन पांच सूक्ष्म तत्वों से बना है, और प्रत्येक तत्व बारी-बारी से मन पर प्रभाव डालता है। यह प्रकृति का नियम है। कोई भी तत्व हमेशा प्रभावी नहीं रहता। बारिश होती है, आप उसे रोक नहीं सकते। हवा चलती है,आप उसे रोक नहीं सकते। सूरज चमकता है, आप उसे रोक नहीं सकते। यह सब अपने आप होता रहता है, और ये घटनाएँ हमारे मन पर सूक्ष्म प्रभाव डालती हैं। उसी तरह, ये पांच तत्व भी मन पर हावी होते हैं और भिन्न-भिन्न भावनाएँ और अनुभव उत्पन्न करते हैं। यह बहुत रोचक और मूल्यवान ज्ञान है।

आम तौर पर, हम अपने भावों और अनुभवों को पाँच मुख्य श्रेणियों में बांट सकते हैं। पहला है भारीपन का अनुभव, जो पृथ्वी तत्व से जुड़ा है। दूसरा है गर्मी या जलन का अनुभव, जो अग्नि तत्व से संबंधित है। यदि किसी में क्रोध, तनाव या जलन अधिक है, तो अग्नि तत्व प्रमुख होता है। कहीं भाग जाने या लगातार गतिशील रहने की इच्छा वायु तत्व के कारण होती है। एकता, मेल-जोल, या प्रवाह का अनुभव जल तत्व से जुड़ा है। आकाश तत्व भय, प्रेम, असहजता या पूर्ण सहजता का संचालन करता है।

जब हम इन तत्वों के साथ अपनी पहचान जोड़ लेते हैं, तो हम इनके प्रभाव में बह जाते हैं। आपने देखा होगा कि कभी-कभी आप गुस्से में कुछ कह देते हैं और बाद में पछताते हैं, क्योंकि उस क्षण आप अपने आप को ‘क्रोध’ के साथ जोड़ लेते हैं। ज्ञान यह है कि आप इन पाँच तत्वों में से कोई भी नहीं हैं। और यह भी समझना है कि कोई भी तत्व स्थायी नहीं है। यदि आप ध्यान से देखें, तो ये कुछ समय के लिए आते हैं और फिर चले जाते हैं, ये बदलते रहते हैं। लेकिन यदि आप इस बात से अनजान हैं, तो कोई एक तत्व लंबे समय तक बना रह सकता है, क्योंकि आप उसे छोड़ते नहीं हैं। यही बंधन कहलाता है।

वास्तव में कोई भी चीज आपको बांध नहीं सकती।आप केवल उसी को बाँध सकते हैं जो पहले से ही गतिशील है! विडंबना यह है कि ये पाँच तत्व आपको नहीं बांधते, बल्कि आप ही उन्हें पकड़कर रखते हैं। यह ऐसे है जैसे कोई मक्खी कमरे से बाहर निकलना चाहती है, लेकिन आप उसे रोक देते हैं, दरवाज़ा बंद कर देते हैं। कुछ बाहर जाना चाहता है, पर आप उसे जाने नहीं देते, आप उसे नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं।

स्वतंत्रता तब अनुभव में आती है जब आप यह समझते हैं कि आप केवल एक साक्षी हैं, जो कुछ भी हो रहा है, उसके दर्शक। आप शुद्ध चेतना हैं, किसी भी घटना या अनुभव से अछूते और निर्मल आकाश की तरह। जब यह समझ आपके भीतर स्थापित हो जाती है, तब आप पूरी तरह मुक्त हो जाते हैं। और यह कब संभव है? अभी, इसी क्षण।

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