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Faith and energy in mind, intention to reach devotees from coast to Sangam at all times : वर्तमान में संगम तट पर नौकाओं का संसार सा बस गया है। 10 हजार नाविक लाखों श्रद्धालुओं को रोज गंगा-यमुना व अदृश्य सरस्वती के संगम पर ले जा रहे हैं। वहां भी एक अलग ही अहसास है। नावों की रेलमपेल के बीच आगे निकलने की होड़ है। संगम स्थल पर भी नावें लगीं हैं। झंडे लहरा रहे हैं। जैसे सनातन की धर्म ध्वजा और ऊर्जावान होकर फहरा रही है। महाकुंभ हो, कुंभ या फिर अर्ध कुंभ, सामान्य दिन हो। महेवा के सोनू व बाबा निषाद की आठवीं पीढ़ी लोगों को नाव से संगम स्थल तक ले जाने में जुटी है। उनकी पीढ़ियां संगम में नाव चला कर ही गुजर-बसर करते दुनिया से विदा हो गईं। 

संगम तक श्रद्धालु पहुंचाने की मंशा 

इनके मन में आस्था है। ऊर्जा है। हर समय तट से संगम तक श्रद्धालुओं को पहुंचाने की मंशा है। चार बजे भोर भी लोग डुबकी लगाने आते हैं। प्रतिदिन ऐसे लोग नाव से संगम जाने वाले हैं, जिनसे वे महीने का कुछ बंधा रुपया लेकर पार उतार रहे हैं। धीरे-धीरे संगम के प्रति इनकी ऐसी आस्था हो गई है कि स्वयं भी सुबह-शाम स्नान करने लगे हैं। खुद भी ऐसे पवित्र, पावन व प्रभु से मिलन की आस वाले स्थल पर रोज आने के इच्छुक हैं। पूर्वजों की अस्थियां संगम जल में प्रवाहित करने वालों से लेकर पहली बार संगम स्नान करने पहुंच रहे लोग इनकी नाव ही ढूंढते हैं।

साथी हाथ बढ़ाना…डुबकी लगाना

प्राचीन संगम तट पर नाव से नीचे उतरने के लिए तखत रखा गया है। दंपती साथी हाथ बढ़ाना की तर्ज पर एक-दूजे का हाथ पकड़कर डुबकी लगा रहे हैं। पहली डुबकी आने के लिए तो बाकी घर, परिवार, समाज व विश्व कल्याण के लिए हैं। संगम पर डुबकी के बाद अहसास ऐसा, जैसे संसार सागर के पार गोते लगा लिए। यहीं बालू के माध्यम से इतनी ऊंचाई कर दी गई है कि आराम से खड़े होकर डुबकी लगा सकते हैं। कुछ दान-दक्षिणा भी कर सकते हैं। महिलाएं सबसे अधिक पूजा-अर्चना कर रही हैं। कुछ लोग स्नान स्थल के बाहर ही डुबकी लगाकर संतुष्टि महसूस कर रहे हैं।

संगम का मतलब, ईश्वर से मिलन

बिहार के पटना से आए शिवकेश झा के होठों पर डुबकी लगाने के बाद विजयी मुस्कान है। ये कमाई, भक्ति, मुक्ति और नए भारत की परिकल्पना का मार्ग है। देखिए, कहीं किसी के अंदर कोई भेदभाव नहीं, सब एक हैं। ये पल फिर न जाने कब जिंदगी में मिलें। सेना के जवान वीरेश बोले, अब स्नान कर लिया तो सब अच्छा ही होगा। मुक्ति मिल गई। जिस मोक्ष प्राप्ति के लिए लोग दुनिया में भटक रहे वो यहीं है। तभी महेश बोल पड़े, ये मुक्ति मार्ग नहीं होता तो फिर यहां संगम काहे होता। संगम का मतलब ही है, ईश्वर से मिलन। महाकुंभ, कुंभ क्या, हर दिन तो संगम के दर्शन मिलते हैं। सामान्य दिनों में भी दो हजार नाविक सभी क्षेत्रों में रहते हैं।

हर कोई संगम ही जाना चाहता

महाकुंभ नगर में 44 घाट बने हैं। हर कोई इनमें स्नान कर रहा है पर तलाश प्राचीन संगम तट की ही है। बिहार के सुपौल जिले के लवलेश पूछते हैं, किला व लेटे हनुमान मंदिर के पास ही प्राचीन संगम तट है। बस हमें वहीं का रास्ता बता दीजिए। जब उन्हें पता चला कि उसी तट पर खड़े हैं तो सब भूल गए। बस संगम की लहरों को नजर भरकर देखते ही रहे। लंबी सांस खींचते हुए बोले, जीवन धन्य हो गया। नाविक से कहा, भइया हमें भी संगम ले चलो। उसने कहा, 15 सौ रुपये लगेंगे 10 लोगों के। बोले 12 लोग हैं तब भी उतने ही लोगे। नाविक बोला-हां। लवलेश व स्वजन नाव पर सवार हुए। नाव आगे बढ़ी। ऐसा ही है संगम, यही महाकुंभ है।

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